भारतीय शास्त्रीय संगीत इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्र का प्रचलन: एक अध्ययन
Main Article Content
Abstract
"प्रयोजनमनुदिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते।"
बिना किसी विशिष्ट प्रयोजन के कोई भी व्यक्ति किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता तब शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने के पीछे कोई विशेष प्रयोजन होता है। संगीत विषय में शोध कार्य अपने आप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि संगीत एक मात्र मनोरंजन का साधन न होकर समस्त जनमानस के दुःखों एवं शोकों को दूर करने की प्राकृतिक औषधि है। संगीत तक प्रदर्शनात्मक कला होते हुए भी एक विद्या की भांति अध्ययन-अध्यापन का विषय भी रहा है। यह एक "ललित कला" होते हुए भी विद्या इसलिए मानी जाती है कि यह निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित है। यह सिद्धान्त ही शास्त्र का निर्माण करते हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत अपनी परंपरागतता और शुद्धता के लिए जाना जाता है। हालांकि, समय के साथ इसमें तकनीकी विकास और आधुनिक वाद्य यंत्रों का प्रभाव बढ़ा है। इलेक्ट्रॉनिक वाद्य यंत्रों का उपयोग पहले पाश्चात्य संगीत तक सीमित था, लेकिन अब यह भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी प्रचलित हो रहा है। यह बदलाव न केवल संगीत की प्रस्तुति में नवीनता लाया है, बल्कि संगीत साधकों और कलाकारों के लिए नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं।